झारखंड के विभूति – JHARKHAND KI VIBHUTI

बिरसा मुंडा

1895 से 1900 तक बिरसा ने अंग्रेज और जमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने के लिए अबुआ दिसुम, अबुआ राज के निर्णायक आंदोलन में कूदकद खुद की आहूति दे दी।

कौन थे

उलिहातु के चलकद गांव में 15 नवंबर, 1870 को जन्म। चाईबासा के मिशन स्कूल में पढ़ाई। बिरसाईत धर्म चलाया। चमत्कार किए। लोग उन्हें भगवान मानते थे। अंग्रेजी शोषण के खिलाफ ग्रामीणों को इकट्ठा किया। कई रोगी ठीक किए। केंद्रीय कारगर रांची में अंतिम सांस ली।

अवदान

आदिवासी समाज में व्याप्त बुराइयों, नशाखोरी और मांस, मछली आदि का सेवन को खत्म करने की कोशिश की। एक ईश्वर की पूजा का आह्वान किया। अंग्रेजों के खिलाफ गांव-गांव के लोगों का संगठित कर आंदोलन के लिए तैयार किया। 1900 में गिरफ्रतारी संतरा वन से हुई।


नीलांबर-पितांबर


21 अक्तूबर 1857 को सहोदर भाई नीलांबर-पीतांबर के नेतृत्व में खेरवार, चेरो तथा भोगताओं ने कई स्थानों पर आक्रमण किया, किंतु पराजित हो गई। शहीद हो गए, पर सम्मान से समझौता नहीं किया।

कौन थे

जन्म पलामू में हुआ था। दोनों साहसी और ब्रिटिश शासन के घोर विरोधी थे। अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ा, शासन का शिकंजा कसता गया, तो जनता में आक्रोश बढ़ा। भाइयों ने कमान थामी। धोखे से परिजनों के साथ भोजन करते पकड़े गये। फरवरी 1858 में फांसी दी गयी।

अवदान

नीलांबर-पीतांबर ने अपनी जाति भोगता एवं खेरवार समुदाय के लोगों को मिलाकर एक शक्तिशाहली संगठन बनाया। उन्होंने लोमहर्षक युध्द ब्रिटिश शासकों के दांत खट्टे कर दिये। उनका मुकाबला करने के लिए अंग्रेजी शासन की शक्तिशाली सेना ने अपना सारा दम-खम लगा दिया।

टिकैत उमराव सिंह

1857 ई की क्रांति में उमराव सिंह और उनके छोटे भाई घासी सिंह ने बेमिसाल वीरता का प्रदर्शन किया। अंग्रेजी सेना को रांची पर कब्जा करने से रोकने में अहम रोल अदा किया था।

कौन थे

जन्म ओरमांझी प्रखंड के खटंगा बांव में हुआ था। 12 गांव के जमींदार थे। अंग्रेजों ने उनके घर को ढाह दिया था। उन्हें जनप्रिय नायक के रूप में याद किया जाता है। उन्हें चुटुपालू घाटी में उनके दीवान शेख भिखारी के साथ एक बट वृक्ष पर एक ही डाली पर फांसी दे दी गई थी।

अवदान

न्याय की पूंजी थी, शोषण तथा अत्याचार के खिलाफ रहे। 1857 के विद्रोह को पूरे छोटानागफर में फैलाया, विद्रोहितयों के बीच तालमेल बिठाया। चुटुपाल घाटी के फलों को तोड़वा दिया तथा वृक्षों को काटकर रांची का रास्ता रोक दिया था। अंत में लड़ते हुए पकड़े गये। शहीद हो गए।

शेख भिखारी

1857 ई. के विद्रोह उन्होंने अपनी वीरता, साहस, बुध्दि एवं राजनीति से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। टिकैत उमरांव सिंह के साथ मिलकर उन्होंने पिठोरिया तक अंग्रेजों को छकाया।

कौन थे

रांची जिले के ओरमांझी थाना अंतर्गत खुदिया गांव में 1819 में जन्मे शेख भिखारी की गिनती स्वतंत्राता संग्राम के महान नायकों में होती है। इनके पिता का नाम पहलवान था। हजारीबाग के विद्रोहियों से संपर्क कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की शुरूआत की। चुटुपाल में फांसी दी गई।

अवदान

शेख भिखारी ने टिकैत उमराव सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों की नाकाबंदी की। रांची को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करा लिया गया। वीर कुंवर सिंह की स्थिति कमजोर होने लगी तो विद्रोहियों ने रांची खाली करके कुंवर सिंह की सहायता की। चतरा में उनकी मुठभेड़ अंग्रेजी सेना से हुई।

शहीद बुधू भगत

1831-32 में हुए कोल विद्रोह के महानायक। आमलोगों पर जबर्दस्त प्रभाव था। लोग उनके एक इशारे पर अपनी जान तक कुर्बान कर देने के लिए सदा तत्पर रहते थे।

कौन थे

कोल विद्रोह के नायक शहीद वीर बुधु भगत ने अंग्रेजी सेना के विरूध्द युध्द में वीरगति पाई। बुधु भागत का जन्म रांची जिला के सिलागाई ग्राम में 17 फरवरी 1792 को हुआ था। कहा जाता है कि उन्हें दैवीय शक्तियां प्राप्त थी, जिसके प्रतीकस्वरूप एक कुल्हाड़ी सदा वह अपने साथ रखते थे।

अवदान

कोल आंदोलन के जननेता शहीद बुधु भगत अंग्रेजों के चाटुकार जमींदारों, दलालों के विरूध्द भूमि, वन की सुरक्षा के लिए जंग छोड़ी थी। आंदोलन में भारी संख्या में अंग्रेज सेना तथा आंदोलनकारी मारे गये थे। आंदोलन के कारण भूमि सुरक्षा के लिए सीएनटी एक्ट बनाया गया।

जतरा टाना भगत

1914 में आंदोलन प्रारंभ किया-गो सेवा करने, प्रत्येक घर में तुलसी चौरा स्थापित करने, अंग्रेजों के आदेशों को न मानने का संदेश दिया। यही गांधी के सच्चे अनुयाई आज बचे हैं।

कौन थे

जतरा भगत (जतरा उरांव) का जन्म गुमला जिले के विष्णुपुर प्रखंड के चिंगारी नवाटोली में सितंबर 1888 में हुआ था। स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ जतरा उरांव तंत्र-मंत्र की शिक्षा प्राप्त करने के लिए तुरिया भगत के शिष्य बन गये। ढकनी में खाना और खादी धारण करना आदर्श।

अवदान

आदिवासी समाज में मांसाहार, पशुबलि, मद्यपान के विरूध्द अभियान छोड़ा। भूत-प्रेत जैसे अंधविश्वासों का डट कर खंडन किया। उनके अनुयाइयों की संख्या बढ़ने लगी। उन्हें टाना भगत कहा जाता था। 1914 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल से रिहाई के कुछ दिनों बाद ही मौत हुई।

तेलंगा खड़िया

1806 में मुरगू गांव में जन्मे तेलंगा खड़िया ने अपने समाज के लोगों को संगठित कर देश को आजाद करने के लिए जगह-जगह जन अभियान चलाया। एक जमीदार ने इनकी हत्या कर दी।

कौन थे

तेलंगा खड़िया सहृदय समाजसेवी थे। अपने समाज को गठित कर भारत को आजाद करने के लिए जगह-जगह बैठक किया करते थे। नया भू कर कानून के खिलाफ तेलंगा खड़िया ने आंदोलन शुरू किया। इससे खफा होकर उनकी हत्या कर दी गई। वह गुमला में दफन हुए।

अवदान

तेलंगा खड़िया ने गुमला जिला के विभिन्न क्षेत्रों में जुरी संगठन बनाकर सरकार के विरूध्द  आंदोलन किया था। उन्होंने सभी धर्म, जाति, वर्ग से अपील की कि देश की आजादी के लिए अंग्रेजों को बहार भगाओ। वह जमीदारों, साहूकारों को अत्याचार करने से मना करते थे।

सिदो-कानो

1855 में संताल हूल हुआ। आंदोलन में संताल, सदानों ने भाग लिया था। चारों भाइयों सिदो,कानो, चांद और भैरव ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ युध्द छेड़ दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।

कौन थे

संथाल विद्रोह के नायक सिदो और कानो सगे भाई थे। उन्होंने अपने दो अन्य छोटे भाइयों चांद और भैरव के साथ संथाल विद्रोह के इतिहास को अमर बना दिया। इनके पिता का नाम चुन्नी मांझी था। चारों भाई महाजनी शोषण और जुल्म के खिलाफ अंग्रेजों से लड़े और शहीद हुए।

अवदान

सिदो-कानो का एकमात्र नारा था – जमींदार, पुलिस, अंग्रेजी राज एवं सूदखोर अमलों का नाश करो और अबुआ राज स्थापित करो। घोषणा की अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो। इस जिले के लिए अलग कानून बनाया गया जिसमें जमींदारी, मांझी प्रधान व्यवस्था की गयी।

पाण्डेय गणपत राय

1857 के विद्रोह में पाण्डेय गणपत राय ने बड़कागढ़ स्टेट के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के साथ विद्रोह का बिगुल बजाया था। दोनों ने स्वाधीनता आंदोलन में अपनी शहादत दी।

कौन थे

अमर शहीद पाण्डेय गणपत राय का जन्म 17 जनवरी 1809 को लोहरदगा जिले के भौरों गांव में हुआ था। वह नागवंशी राज्य की राजभाषा नागपुरी तथा फारसी और उर्दू के प्रकांड विद्वान थे। वह नागवंशी राजा के सफल दीवान थे। उनके पिता का नाम बिशुन राय था।

अवदान

एक अगस्त, 1857 को हजारीबाग तथा रांची में अंग्रेजी सेना की टुकड़ियों के हिंदुस्तानी सिपाही बगावत पर उतर आए। छोटानागपुर की आजादी की घोषणा कर दी गई। भौरों में राजधानी स्थापित कर शासन के खिलाफ बगावत की। उन्हें 21 अप्रैल 1858 को फांसी दे दी गयी।

 

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